पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था और शासन
संदर्भ
- सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में अघोषित नकदी और चुनावी अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए निर्देश जारी किए हैं। न्यायालय ने कहा कि अवैध धन से प्रभावित मतदाताओं की पसंद स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों तथा ‘लोकतंत्र के मूल स्वरूप’ के लिए हानिकारक है।
चुनावों में काला धन
- चुनावों में काले धन का उपयोग मतदाताओं को प्रभावित करने, चुनाव प्रचार में सहायता देने, नकदी या उपहार वितरित करने तथा कानूनी ढाँचे से बाहर अघोषित धन के माध्यम से चुनाव संबंधी व्ययों को पूरा करने के लिए किया जाता है।
- यह चुनावी प्रतिस्पर्धा के लिए असमान परिस्थितियाँ पैदा करता है और धन, अपराध तथा राजनीति के बीच गठजोड़ को बढ़ावा दे सकता है।
- यह मुद्दा प्रथिक परसरामपुरिया बनाम कर्नाटक राज्य मामले में सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष आया। यह मामला कर्नाटक उच्च न्यायालय के वर्ष 2015 के उस निर्णय से संबंधित था, जिसमें मतदाताओं को रिश्वत देने के लिए नकदी जमा करने के आरोप से संबंधित FIR को निरस्त कर दिया गया था।
- सर्वोच्च न्यायालय ने कार्यवाही का दायरा बढ़ाते हुए चुनावों में काले धन की व्यापक और प्रणालीगत समस्या की जाँच की।
वर्तमान स्थिति
- भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने न्यायालय के समक्ष आँकड़े प्रस्तुत किए, जिनके अनुसार 2024 के लोकसभा चुनावों के दौरान 3,87,430 FIR दर्ज की गईं। इनमें से केवल लगभग 42.9% (1,66,044) मामलों में दोषसिद्धि हुई, जबकि शेष मामले जाँच या विचारण के स्तर पर लंबित थे।
- न्यायालय ने कहा कि प्रशासन में परिवर्तन के बाद चुनाव संबंधी अभियोजन मामलों को वापस लिया जाना दंड से मुक्ति की धारणा को उत्पन्न कर सकता है।
काला धन लोकतंत्र के लिए खतरा क्यों है?
- मतदाता की पसंद को विकृत करना: वित्तीय प्रलोभन एक सूचित चुनावी निर्णय को लेन-देन में बदल देते हैं।
- असमान चुनावी परिस्थितियाँ उत्पन्न करना: अवैध वित्तपोषण तक अधिक पहुँच रखने वाले उम्मीदवारों को अनुचित लाभ प्राप्त होता है।
- राजनीति के अपराधीकरण को बढ़ावा देना: अघोषित धन अपराध, व्यवसाय और राजनीति के बीच गठजोड़ को सुदृढ़ करने में सहायक हो सकता है।
- जनविश्वास को कमजोर करना: चुनावी प्रक्रिया में हेरफेर की धारणा लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति जनता के विश्वास को कमजोर करती है।
- नीति-निर्माण पर प्रभाव डालना: अवैध वित्तपोषण पर निर्भर उम्मीदवार निजी हितों के प्रभाव में आ सकते हैं।
- लोकतांत्रिक समानता को कमजोर करना: राजनीति में अत्यधिक धन का प्रभाव अपेक्षाकृत कम संपन्न लोगों की राजनीतिक आवाज को दबा सकता है।
- सर्वोच्च न्यायालय ने इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण मामले में न्यायमूर्ति एच.आर. खन्ना की उस टिप्पणी का उल्लेख किया, जिसके अनुसार लोकतंत्र का आधार स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों में विश्वास है।
- अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ मामले में न्यायालय ने यह दोहराया कि “मतपत्र सबसे शक्तिशाली बंदूक से भी अधिक प्रभावशाली है।”
संवैधानिक, कानूनी एवं संस्थागत ढाँचा
- निर्वाचन आयोग: व्यय पर्यवेक्षकों , स्थैतिक निगरानी दलों और उड़न दस्तों के माध्यम से अवैध चुनावी व्यय का पता लगाता है।
- अनुच्छेद 324: यह निर्वाचन आयोग को चुनावों के संचालन और निगरानी के लिए व्यापक अधिकार प्रदान करता है।
- जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951: यह चुनावी अपराधों, भ्रष्ट आचरण और चुनावी व्यय से संबंधित वैधानिक ढाँचा प्रदान करता है।
- आयकर प्राधिकरण: निर्धारित मानदंडों के आधार पर अघोषित नकदी और संपत्तियों की जाँच करता है तथा उनकी जब्ती की कार्रवाई कर सकता है।
- न्यायपालिका: चुनाव संबंधी मामलों की समीक्षा करती है तथा यह सुनिश्चित करती है कि चुनावों से संबंधित अभियोजन और उनकी वापसी कानून के अनुरूप हो।
- न्यायालय ने चुनावी वित्तीय असमानता से जुड़े मुद्दों का उल्लेख कंवर लाल गुप्ता बनाम अमर नाथ चावला (1975), गोस्वामी समिति रिपोर्ट (1990), वोहरा समिति रिपोर्ट (1993) तथा विधि आयोग की 255वीं रिपोर्ट (2015) के संदर्भ में किया।
सर्वोच्च न्यायालय के हालिया निर्देश
- न्यायालय ने निर्देश दिया कि:
- जब्त की गई नकदी/संपत्ति की सूचना 24 घंटे के अंदर संबंधित जिला मजिस्ट्रेट/अपर जिला मजिस्ट्रेट/न्यायालय को दी जाए तथा प्रथमदृष्टया चुनावी संबंध स्थापित करने वाले कारणों का उल्लेख किया जाए।
- जाँच सामान्यतः एक वर्ष के अंन्दर पूरी की जानी चाहिए। विलंब होने पर उसके कारण दर्ज किए जाएँ और निर्वाचन आयोग को सूचित किया जाए।
- जाँच की स्थिति से संबंधित त्रैमासिक रिपोर्ट निर्वाचन आयोग को प्रस्तुत की जाए।
- स्थैतिक निगरानी दलों द्वारा पकड़ी गई ₹10 लाख से अधिक की नकदी की सूचना आयकर अधिकारियों को दी जाए।
- उच्च न्यायालय उम्मीदवारों तथा वर्तमान सांसदों/विधायकों के विरुद्ध मामलों के शीघ्र निपटारे के लिए विशेष न्यायालयों को नामित करें।
- किसी चुनावी चक्र के दौरान उम्मीदवारों के विरुद्ध अभियोजन वापस लेने के लिए संबंधित उच्च न्यायालय की पूर्व अनुमति आवश्यक होगी।
- लंबित चुनावी अपराधों से संबंधित मामलों का शीघ्र निपटारा किया जाए।
- निर्वाचन आयोग और सरकारों को 18 नवंबर 2026 तक अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी।
आगे की राह: उपायों को सुदृढ़ करना
- चुनावी अपराधों की समयबद्ध जाँच और सुनवाई सुनिश्चित करना।
- निर्वाचन आयोग की तकनीकी एवं वित्तीय-जाँच संबंधी क्षमता को सुदृढ़ करना।
- निर्वाचन आयोग, आयकर विभाग, पुलिस तथा अन्य प्रवर्तन एजेंसियों के बीच समन्वय में सुधार करना।
- राजनीतिक दलों और चुनाव प्रचार के वित्तपोषण के खुलासे के लिए पारदर्शी तंत्र स्थापित करना।
- चुनावी अभियोजन को राजनीतिक उद्देश्यों से वापस लेने की प्रवृत्ति पर रोक लगाना।
- प्रलोभन स्वीकार करने के दुष्प्रभावों के संबंध में मतदाताओं की जागरूकता बढ़ाना।
- चुनावी राजनीति की अपारदर्शी निजी वित्तपोषण पर निर्भरता कम करने के लिए संस्थागत सुधारों पर विचार करना।
निष्कर्ष
- स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों के लिए केवल मतदान का अधिकार पर्याप्त नहीं है, बल्कि मतदाताओं को बिना किसी दबाव या अवैध वित्तीय प्रभाव के अपनी पसंद का स्वतंत्र रूप से प्रयोग करने की स्वतंत्रता भी आवश्यक है।
- सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश चुनावी प्रक्रिया की शुचिता और लोकतांत्रिक जवाबदेही की रक्षा के लिए संस्थागत ढाँचे को सुदृढ़ करते हैं।
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